पूज्यपाद अनन्तश्रीविभूषित उत्तराम्नाय ज्योतिष्पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामिश्रीः अविमुक्तेश्वरानन्दः सरस्वती महाराज 1008 का संक्षिप्त परिचय

सनातनी दृष्टिकोण से समस्त विश्व में भारत की भूमि सबसे अधिक पवित्र मानी जाती है। इसी भूमि पर समय-समय पर अनेक भगवदवतार हुए हैं। भगवान् नारायण से आरम्भ होने वाली गुरु-परम्परा में भगवत्पाद आद्य शंकराचार्य जी 507 ईसा पूर्व अवतरित हुए और उन्होंने भारत को एकता के सूत्र में निबद्ध किया। भारत की चार दिशाओं में चार वेदों के आधार पर चार आम्नाय पीठों की स्थापना कर देश की धार्मिक व साँस्कृतिक सीमा को सुदृढ बनाया।

इन्हीं चार पीठों में से अन्यतम उत्तराम्नाय ज्योतिर्मठ बदरिकाश्रम हिमालय के वर्तमान जगद्गुरु शंकराचार्य परमाराध्य स्वामिश्रीः अविमुक्तेश्वरानन्दः सरस्वती महाराज आज सनातन संजीवनी के रूप में हम सबको प्राप्त हैं।

स्वामिश्रीः अविमुक्तेश्वरानन्दः सरस्वती; यह एक ऐसा नाम है जिनका जीवन एक आदर्श के रूप में पूरे विश्व के सामने है। जिस प्रकार सूर्य को छिपाकर नही रखा जा सकता वह जहाँ रहता है स्वयं प्रकाशित होकर पूरे विश्व को प्रकाशित करता है ऐसे ही स्वामिश्रीः स्वयं तो आत्मज्ञान के आनन्द से परिपूर्ण हैं ही पर जो भी इनके सम्पर्क में आ जाता है वह भी आत्मज्ञान की ओर अग्रसर होकर आनन्दित हो जाता है।

आविर्भाव –
उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले के ब्राह्मणपुर गाँव में श्रावण शुक्ल द्वितीया दुन्दुभि संवत् 2026 (तदनुसार दिनांक 15 अगस्त 1969 ई.) को पूजनीया माता अनारा देवी तथा पिता पं रामसुमेर पाण्डेय जी ने इस अनमोल रत्न को जन्म दिया और नाम रखा उमाशंकर पाण्डेय।

शिक्षा –
ब्राह्मणपुर के स्थानीय विद्यालय में प्रारम्भिक शिक्षा हुई। बाल्यकाल से ही उमाशंकर की कुशाग्र बुद्धि एवं प्रत्युत्पन्नमति से सभी चमत्कृत थे। तीसरी कक्षा में ही अध्यापकगण इनको अपनी कुर्सी पर बिठाकर पढाते थे।
इसके बाद की शिक्षा गुजरात के बडौदा स्थित महाराजा सयाजी राव युनिवर्सिटी में हुई। इसके बाद पूज्य शंकराचार्य जी महाराज का सान्निध्य पाकर उनकी प्रेरणा से काशी में संस्कृत अध्ययन के लिए आए जहाँ उनको धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज की उनके अन्तिम समय में सेवा करने का सौभाग्य भी प्राप्त हुआ। यहाॅ पर संस्कृत विद्यालय में अध्ययन किया फिर उसके बाद सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय में नव्य व्याकरण से आचार्य तक की पढाई पूरी की। आपने भट्टोजी दीक्षित कृत “शब्दकौस्तुभ” पर अपना शोध लिखा। यहाॅ पर उन्होंने छात्रसंघ के उपाध्यक्ष और विद्यार्थी परिषद् के प्रत्याशी के रूप में अध्यक्ष पद को भी अलंकृत किया और अपनी नेतृत्व क्षमता का सबको आभास कराया।

नैष्ठिक ब्रह्मचर्य दीक्षा –
वर्ष 2000 ई. में पूज्यपाद शंकराचार्य जी महाराज ने कोलकाता में इनको नैष्ठिक ब्रह्मचारी की दीक्षा प्रदान की और आनन्दस्वरूप नाम दिया।

दण्ड संन्यास दीक्षा
वर्ष 2003 ई. में पूज्य शंकराचार्य जी द्वारा ब्रह्मचारी आनन्दस्वरुप की संन्यास दीक्षा हो गई और वे आनन्दस्वरूप से स्वामी अविमुक्तेश्वरानन्द सरस्वती हो गये।

पूर्णाभिषेक दीक्षा-
श्रीविद्या साधना की परम्परा में सबसे बडी माने जाने वाली पूर्णाभिषेक दीक्षा वर्ष 2010 में हुई। श्रीविद्या साधना की परम्परा का निर्वहन करते हुए पूज्य स्वामिश्रीः प्रतिदिन पाँच समय पंचायतन देवताओं की उपासना विधिपूर्वक करते हैं।

काशी सहित देश में जब जब भी धर्म के विरुद्ध कोई बात आती है तब तब महाराजश्री सबसे पहले शास्त्रसम्मत वक्तव्य देते हैं और समाज को सही दिशानिर्देश देते हैं। महाराजश्री की यह विशेषता है कि वे केवल वक्तव्य देकर ही शान्त नही बैठते अपितु समस्या के सम्यक् समाधान का पूरा प्रयास भी करते हैं।
इसी क्रम में उन्होंने अनेक उल्लेखनीय आन्दोलन चलाए।

रामसेतु रक्षा अभियान-
जब रामसेतु को तोडने का आदेश तत्कालीन केन्द्र की सरकार ने दिया था तब महाराजश्री ने रामसेतु रक्षा आन्दोलन आरम्भ किया और इसे तब तक चलाया जब तक सेतु रक्षित नहीं हो गया।

श्रीरामजन्मभूमि मुकदमे में महत्वपूर्ण योगदान-
पूज्यपाद ब्रह्मलीन शंकराचार्य जी ने रामजन्मभूमि के लिए अनेक उल्लेखनीय प्रयास किए। उनके द्वारा निर्मित श्रीरामजन्मभूमि पुनरुद्धार समिति के उपाध्यक्ष पद पर रहते हुए महाराज जी ने रामजन्मभूमि के मुकदमे को न्यायालय में लडा। इस मुकदमे में एक्सपर्ट विटनेस के रूप में महाराज जी ने रामजन्मभूमि के अनेक शास्त्रीय प्रमाण न्यायालय के समक्ष रखे। मुकदमे के निर्णय में इसका उल्लेख विद्वान् न्यायाधीशों ने अनेक स्थानों पर किया है। इसी तरह चारों शंकराचार्यों, पाॅच वैष्णवाचार्यों और तेरह अखाडों के प्रमुखों के “रामालय न्यास” के भी आप सचिव हैं।

सार्वभौम गंगा सेवा अभियानम्-
महाराज जी ने गंगा की अविरलता और निर्मलता के लिए अथक प्रयास किए। काशी के चितरंजन पार्क पर सभी प्रमुख पंथों के लोगों द्वारा लम्बे समय तक ऐतिहासिक धरना प्रदर्शन आयोजित कराया। इसके बाद वर्ष 2012 में अनेक गंगा तपस्वियों द्वारा अन्न-जल त्याग तपस्या का संचालन कराया। किसी की गति की रोक देना असम्मान है। गंगाजी की भी गति को नहीं रोका जाना चाहिए। उसकी अविरल बहने वाली धारा को बाँधों में बाँधकर अवरुद्ध नहीं किया जाना चाहिए। गंगा को राष्ट्र नदी भी घोषित किया गया है तो जो सम्मान राष्ट्र ध्वज को प्राप्त है वही सम्मान माता गंगा को भी प्राप्त होना चाहिए। जैसे तिरंगे के अपमान पर कडी सजा दी जाती है वैसे ही माता गंगा पर गन्दगी डालकर उनका अपमान करने वालों को भी कडा दण्ड दिया जाना चाहिए। गंगा की धारा अविरल और निर्मल होकर सदा प्रवाहित रहनी चाहिए।* गंगाजी को राष्ट्रनदी घोषित करने की मांग भी आप ही की थी जो केन्द्र सरकार द्वारा स्वीकार की गयी थी।

माता पूर्णाम्बा देवी के सम्मान की रक्षार्थ निर्जल तपस्या-
वर्ष 2016 में महाराज जी ने आदि शंकराचार्य जी के आविर्भाव के 2525 वर्ष पूर्ण होने के अवसर पर ज्योतिर्मठ महिमा महोत्सव कार्यक्रम का आयोजन किया जिसमें देश भर के विद्वान् उपस्थित थे। इस आयोजन के क्रम में ज्योतिर्मठ की अधिष्ठात्री माता पूर्णाम्बा देवी का पूजन करने महाराज जी गये और वहाॅ के कुछ अवांछित तत्वों ने उनको पूजन करने से रोक दिया। उस समय महाराज जी ने वहाॅ निर्जल तपस्या आरम्भ की और देवी जी की पूजा-अर्चना में हो रही सभी अव्यवस्थाओं को सही करते हुए नियमित पूजा आरम्भ कराई।

मन्दिर बचाओ आन्दोलनम्-
महाराजश्री ने जब भी काशी सहित देश में मन्दिर एवं मूर्तियों को केन्द्र अथवा राज्य सरकारों द्वारा तोडा गया उसका खुलकर विरोध किया। उनका कहना है कि हम विकास के विरोधी नहीं हैं। गुरु परम्परा के महान् आचार्य बादरायण व्यास जी ने अनेक पुराणों की रचना की और भारत के विविध क्षेत्रों के धार्मिक व आध्यात्मिक महत्व को निरूपित किया है। इन इतिहास एवं पुराणों का वाचन धर्माचार्य करते हैं जिसके कारण जनता उन स्थानों पर पहुंचती है और तीर्थ यात्रा के कारण रोजगार के अनेक अवसर बढते हैं और क्षेत्र का विकास होता है। मन्दिर आदि धार्मिक स्थल विकास के सहायक हैं, न कि विरोधी। इसलिए मन्दिरों को संरक्षित करते हुए विकास करना चाहिए।
वे किसी पार्टी विशेष के समर्थक हैं और न ही विरोधी। सत्य सनातन धर्म की ओर जहाँ से भी खरोंच आती दिखती है, वे मुखर हो उठते हैं।
उन्होंने उत्तर प्रदेश में मायावती के शासनकाल में तोडे जा रहे रानी भवानी मन्दिर को तोडने का विरोध किया। समाजवादी सरकार के शासनकाल में भगवान् गणेश जी की प्रतिमा के अपमान किए जाने का उन्होंने विरोध किया। वर्तमान में योगी आदित्यनाथ के शासनकाल में केन्द्र सरकार के आदेश पर काशी विश्वनाथ कॉरिडोर के निर्माण के समय में तोडे जा रहे असंख्य मन्दिरों एवं मूर्तियों की रक्षा के लिए आवाज उठाई और मन्दिर बचाओ आन्दोलनम् चलाया। इस हेतु उन्होंने 12 दिनों का पराक व्रत (केवल जल पीते हुए) किया।
कोरिडोर निर्माण के नाम पर कूडे में फेंके गये शिवलिंग आज भी काशी के लंका थाने में रखे हुए हैं जिसकी नियमित पूजा पूज्य महाराज जी की ओर से की जा रही है और इस सन्दर्भ का एक वाद भी न्यायालय में लम्बित हैं।

108 फीट ऊँचा ध्वजारोहण-
वर्ष 2021 में छत्तीसगढ के कवर्धा शहर में जब अन्य मतावलम्बियों ने भगवा ध्वज का अपमान किया तब महाराज जी ने उसका कडा प्रतिकार किया और उसी स्थान पर पुनः 108 फुट ऊँचा विशाल धर्मध्वज लहराया जो आज भी सनातन धर्म के गौरव को प्रकट करता हुआ फहरा रहा है।*

ज्ञानवापी में प्रकट आदि विश्वेश्वर भगवान् के लिए तपस्या-
हाल ही में जब भगवान् काशी विश्वेश्वर प्रकट हुए तब महाराज जी काशी पधारे और उन्होंने कहा कि जब भी भगवान् प्रकट होते हैं तो उनकी पूजा किए जाने का नियम हमारे धर्मशास्त्रों में बताया गया है। ब्रह्मलीन शंकराचार्य जी के आदेश से वे काशी पहुचे और पूजन के लिए जैसे ही प्रस्थित हुए तब वाराणसी पुलिस प्रशासन ने उन्हें बलपूर्वक श्रीविद्यामठ में ही रोक दिया। तब पूज्य महाराज जी ने 108 घण्टे की निर्जल तपस्या की। उनका कहना था कि *जब उच्चतम न्यायालय ने अपने निर्णय में स्पष्ट रूप से शिवलिंग के विधिपूर्वक संरक्षण का आदेश वाराणसी के जिलाधिकारी को दिया है तो उसका पालन न होना न्यायालय के आदेश की अवहेलना है। इस सन्दर्भ में उन्होनें जिलाधिकारी को नोटिस भी दिया और इस सन्दर्भ का एक वाद भी न्यायालय में दायर किया है जिस पर सुनवाई हो रही है।

जगद्गुरुकुलम्-
वर्तमान में पूज्यपाद महाराज जी की 10 हजार बच्चो के एक जगद्गुरुकुलम् के निर्माण की योजना चल रही है जिसमें बच्चों को निःशुल्क अन्न-वस्त्रादि देकर अध्यापन कराया जाएगा। 108 बच्चों का पहला परिसर परमहंसी गंगा आश्रम में आरम्भ हो चुका है। दूसरा 108 बच्चों का परिसर काशी में चलने लगा है। शीघ्र ही परिसर का विस्तार प्रस्तावित है।

परमधर्मसंसद् 1008 की स्थापना-
सनातन धर्म की रक्षा के लिए महाराजश्री ने पूज्य शंकराचार्य जी महाराज के निर्देश पर “परमधर्मसंसद् 1008” की स्थापना की है जिसके द्वारा विश्व भर के सनातनी लाभान्वित हो रहे हैं।

महाराज जी समस्त विश्व के लिए सनातन संजीवनी के रूप में हम सबको प्राप्त हुए हैं। जब भी सनातन धर्म कमजोर या निष्प्राण होता सा दिखता है तब-तब महाराजश्री धर्म रक्षा का बिगुल बजाते हुए सामने आते हैं और समाज व देश का मार्गदर्शन करते हैं। उनका जीवन एक आदर्श के रूप में आज हम सबके समक्ष है।
पूज्य श्रीचरणों में कोटि-कोटि प्रणाम।

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