भगवत्पाद आद्य शंकराचार्य जी महाराज

आज से लगभग 2522 वर्ष पूर्व केरल प्रदेश के कालटी नामक ग्राम में माता आर्याम्बा और पिता शिवगुरु से भगवान् शंकर ने देवताओं की प्रार्थना एवं माता-पिता की तपस्या से बालक शंकर के रूप में अवतरित हुए। बाल्यकाल से ही आपकी अद्भुत प्रतिभा बड़े बबे विद्वारनों को चमत्कृत करती रही। दो वर्ष की अल्पायु में ही आप मातृभाषा के विद्वान् बनकर उसमें साहित्य रचना करने लगे थे। उनकी इस प्रतिभा से प्रभावित होकर केरल के तत्कालीन नरेश राजशेखर ने उन्हें राजदरबार में सम्मानित करने हेतु आमन्त्रित किया । परन्तु बालक शंकर ने अपनी विद्याभ्यास की व्यस्तता बनाकर राजसेवकों को विनय पूर्वक वापस कर दिया । तब राजा स्वयं बालक शंकर का दर्शन करने आया और उनकी अलौकिक प्रतिभा का दर्सन कर अभिभूत हुआ।

आचार्य शंकर के बारे में प्रसिद्धि है कि उन्होंने आठ वर्ष की अवस्था में चारों वेद, बारह वर्ष में सभी शास्त्रों का अध्ययन कर लिया था और उनके द्वारा रचा गया भाष्य जो कि लोक में शांकरभाष्य के नाम से प्रसिद्ध है, का प्रणयन उन्होंने सोलह वर्ष की अवस्था में ही कर दिया था। वे लोकोत्तर प्रतिभा के धनी थे । आठ वर्ष की आयु में ही उन्हें ज्ञान की प्राप्ति हो गई थी और वे माता से आज्ञा लेकर नर्मदा तट स्थित गोविन्दपादाचार्य जी से संन्यास ग्रहण कर शंकर भगवत्पाद के रूप में प्रतिष्ठित हुए थे ।
आचार्य शंकर ने चार बार पैदल ही सारे देश का भ्रमण किया था और स्थान स्थान पर अपने ज्ञान के आलोक से लोगों को प्रभावित किया था । जहाँ वैचारिक मतभेद था उसे उन्होंने शास्त्रार्थ द्वारा निरस्त किया और सारे देश में एक ही सत्य सनातन धर्म की प्रतिस्थापना की । उनके समय में 72 सम्प्रदायों में सारा समाज बंट चुका था और मुख्य रूप से बौद्ध मतानुयायी वैदिक मत के विपरीत चलने को लोगों को प्रेरित कर रहे थे । ऐसे समय में आचार्य शंकर ने मतवादों का निरास करते हुए अद्वैत मत की प्रतिष्ठा की । उनके द्वारा दश उपनिषदों और गीता तथा ब्रह्मसूत्र पर किया गया भाष्य अत्यन्त प्रसिद्ध है ।

उत्तराम्नाय  श्री-ज्योर्तिमठः एक परिचय -

सत्य सनातनधर्म
हम सभी में से प्रत्येक के मन में स्वयं को सुरक्षित रखते हुए गरिमापूर्ण, स्वस्थ, संतुष्ट, सुखमय जीवन जीने की इच्छा रहती है जिसके लिए हमारे और आपके जीवन का सारा कार्य व्यवहार है।
परमपिता परमात्मा की कृपा और उपदेश से हमारे पूर्वजों ने यह जान लिया था कि धर्माचरण ही इन सबसे समन्वित जीवन दे सकता है । इसलिए कहा – ‘धर्मो रक्षति रक्षितः’। ‘धर्मो विश्वस्य जगतः प्रतिष्ठा ‘आदि । वे सदा से ही धर्म का आचरण करते रहे हैं इसी से हमारे धर्म का नाम सनातन धर्म है । यह सदा से रहा है और सदा ही रहने वाला है।

आदि शंकराचार्य –
सत्य सनातन धर्म को सदा जीवन्त बनाए रखने के लिए प्रभु का समय-समय पर अवतार होता आया है । ऐसा ही एक शिवावतार तब हुआ जब देश में बौद्घ व्यवहार बढ़ गया और वेद – शास्त्रों के प्रति आम लोगों में अनास्था उत्पन्न की जाने लगी । तब सनातन धर्म की पुनर्स्थापना के लिए आज से लगभग ढाई हजार वर्ष पहले स्वयं भगवान् शिव शंकर केरल प्रदेश के कालटी नामक गाँव में पिता शिवगुरु और माता आर्याम्बा के घर शंकर नाम से अवतरित हुए।
8 वर्ष में समस्त वेदों के ज्ञाता श्री शंकर ने संन्यास धारण कर 12 वर्ष की अवस्था तक सभी शास्त्रों का ज्ञान पाया और 16 वर्ष की अवस्था तक उपनिषदों, भगवद्गीता तथा ब्रह्मसूत्रों पर शांकर भाष्य लिख दिया  । पूरे देश की पदयात्रा की ।  शास्त्रार्थ के माध्यम से सनातन सिद्धांतों के विरोधी 72 मतों को पराजित किया और भविष्य में भी सनातन धर्म का प्रचार-प्रसार होता रहे इस आशय से चारों वेदों को आधार बनाकर देश की चार दिशाओं में चार आम्नाय  मठों की स्थापना कर उनकी चार पीठों पर अपने चार सुयोग्य शिष्यों को अभिषिक्त किया और अपने अनुयायियों को उन्हें शंकराचार्य ही समझने तथा तदनुरूप व्यवहार करने को कहा । तब से चारों पीठों पर चार शंकराचार्य अपने-अपने निर्धारित क्षेत्राधिकार में सनातन धर्म का संरक्षण करते आ  रहे हैं । इन्हीं चारों में से उत्तर दिशा में अथर्ववेद का मठ है ज्योतिर्मठ।

ज्योर्तिमठ नाम का तात्पर्य –

ज्युतृ दीप्तौ अथवा द्युत दीप्तौ धातु से क्रमशः इसि, इसिन् प्रत्यय करने पर ज्योतिः शब्द निष्पन्न होता है ।जिसका अर्थ ‘ज्योतते  इति ज्योतिः’ अर्थात् प्रकाशक होता है। प्रकाशक होने से दृष्टि, दीप, सूर्य ,चंद्र, अग्नि, नक्षत्र यहाॅ तक कि श्रीविष्णु को भी ज्योति शब्द कहा गया है। तात्पर्य यह है कि सभी प्रकाशक पदार्थ ‘ज्योति’ कहलाते हैं। गहरे में जाने पर ज्योति शब्द का अर्थ उसमे पहुँच जाता है जो सबका प्रकाशक है। अर्थात् सर्वावभाषक चैतन्य, स्वयंप्रकाश आत्मा। भगवान् आदि शंकराचार्य जी ने ज्योतिश्चरणाभिधानात् ब्रह्मसूत्र में अधिकरण के अंत में ‘अतः परमेव ब्रह्म ज्योतिः शब्दमिति सिद्धम्’ कहकर ज्योतिः शब्द का अर्थ परब्रह्म किया है। व्यवहार में भी हम ‘दीपो ज्योतिः परब्रह्म दीपोज्योतिर्जनार्दन। दीपो हरतु मे पापं दीपज्योतिर्नमोस्तु ते’ कहकर दीप की ज्योति को प्रणाम करते हैं।
अतः भगवान् शंकराचार्य जी ने उत्तराम्नाय को ज्योतिर्मठ संज्ञा देकर इस मठ को उत्तमाधिकारी को ब्रह्मज्ञान कराने वाला, मध्यमाधिकारी को भगवद्प्राप्ति कराने वाला और सर्वसामान्य को धर्मज्ञान के द्वारा पाप से बचाने वाला संकेतित किया है।

ज्योतिर्मठाम्नाय

आदि शंकराचार्यजी  ने चार पीठों की स्थापना कर मठों का अनुशासन सुनिश्चित किया। मठाम्नाय महानुशासनम् के अनुसार उत्तराम्नाय ज्योतिर्मठ का क्षेत्र बदरिकाश्रम, संप्रदाय आनन्दवार, संन्यासी गिरि-पर्वत-सागर, देवता (बदरी)नारायण, देवी पूर्णागिरि, आचार्य तोटकाचार्य, तीर्थ अलकनन्दा, ब्रह्मचारी आनन्द, वेद अथर्ववेद, महावाक्य अयमात्मा ब्रह्म, गोत्र भृगु, क्षेत्राधिकार कुरु -कंबोज-कश्मीर-पंजाब-सिन्ध सहित समस्त उत्तर प्रदेश है।
ज्योतिर्मठ की ज्योति हैं परमाराध्य
ऐसा यह ज्योतिर्मठ भारत भूमि के मुकुट हिमालय का मुकुटमणि होकर सुशोभित है और उस मणि की प्रभा के रूप में विद्यमान हैं वर्तमान ज्योतिष्पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य परमाराध्यचरण स्वामी श्री स्वरूपानंद सरस्वती जी महाराज, जो मठाम्नाय महानुशासन् में शंकराचार्य पद के लिए वर्णित योग्यताओं –
‘शुचिर्जितेन्द्रियो वेद वेदांगादि विशारदः।
योगज्ञः सर्व शास्त्राणां स मदास्थानमाप्नुयात् ‘ ।।
के धारक हैं और जिन्होंने विगत 48 वर्षों से ज्योतिर्मठ की ज्योति को निरंतर ज्योतित किया है।
स्वर्ण ज्योति महामहोत्सव
पूज्यपाद महाराजश्री के ज्योतिष्पीठाधीरोहण के आगामी 50वें स्वर्णजयन्ती वर्ष का उत्सव अभी से उनके शिष्य-प्रशिष्य स्वर्णज्योति-महामहोत्सव के रूप में मना रहे हैं और इसी माध्यम से धराधाम के हर कोने में ज्योतिर्मठ की ज्योतित ज्योति को पहुँचा रहे हैं ।महामहोत्सव के अंतर्गत अनेक स्थानों पर ज्योतिर्मठ की ज्योति पहुँच रही है। कार्यक्रम में ढाई हजार विशिष्ट जनों का स्वर्णज्योति सम्मान भी संकल्पित है।

ज्योतिर्मठ के प्रथम आचार्य

ज्योतिर्मठ के प्रथम आचार्य श्री तोटकाचार्य जी थे जो भगवान् शंकराचार्य जी के चार प्रमुख शिष्यों में से एक थे। गिरी नाम के संन्यासी तोटकाचार्य के रूप में इसलिए प्रसिद्ध हुए क्योंकि गुरु सेवा में लगे इनके बारे में सहपाठियों के मन में जब यह भ्रांति आ गई कि इन्हें शास्त्र ज्ञान नहीं तब इन्होंने सहसा तोटक छन्द में गुरु की स्तुति की। इनके द्वारा रचित श्रुतिसारसमुद्धरणम् ग्रन्थ और केरल के त्रिशूर में स्थापित विशाल मठ इनके शास्त्र और व्यवहारज्ञान के आज भी निदर्शक हैं।
दीर्घजीवी आचार्य परंपरा
ज्योतिर्मठ भव्यताओं के साथ दिव्यताओं से भी भरा है।यहाँ के प्रथम आचार्य तोटकाचार्यजी से लेकर 21  दीर्घजीवी आचार्यों की परंपरा का श्रवण आज भी किया जाता है जिनके नित्य-निरन्तर स्मरण से योगसिद्धि की प्राप्ति कही गई है।
तोटको विजयः  कृष्णः कुमारो गरुडः शुकः।
विन्ध्यो विशालो बकुलो वामनः सुंदरोऽरुणः।।श्रीनिवासस्तथानन्दो विद्यानन्दः शिवो गिरिः।
विद्याधरो गुणानन्दो नारायण उमापतिः।।
एते ज्योतिर्मठाधीशा आचार्याश्चिरजीविनः।
य एतान् संस्मरेन्नित्यं योगसिद्धिं स विन्दति।।
मध्यकालीन आचार्य परंपरा

21 चिरजीवी आचार्यों के बाद 21 और आचार्यों का विवरण मिलता है जिन्होंने ज्योतिर्मठ की ज्योति से दिग्दिगन्त को आलोकित किया। उनके योगपट्ट इस प्रकार हैं-
बालकृष्णो हरिब्रह्म हरिस्मरण एव च।
वृन्दावनो ह्यनंतश्च भवो कृष्णो हरिस्तथा।।
ब्रह्म देवो रघुः पूर्णः कृष्णदेवो शिवस्तथा।
बालो नारायणोपेंद्रो हरिश्चंद्रस्सदासुखः।।
केशव-नारायणौ चैव रामकृष्णस्तथैव च।।
रामकृष्णाचार्य जी के बाद प्राकृतिक परिस्थितिवश  ज्योतिर्मठ को 165 वर्षों तक गुजरात के धोलका से भी आचार्यों ने संचालित किया और परंपरा को अक्षुण्ण बनाए रखा। उन नौ आचार्यों के नाम हैं- श्रीटोकरा(तोटका)नंद, पुरुषोत्त्तमानंद, कैलाशानंद, विश्वेश्वरानंद, अच्युतानंद, राजराजेश्वरानंद, मधुसूदनानंद, विजयानंद और अद्वैतानंदजी।
अद्वैतानंद जी के बाद यह परंपरा पूज्यपाद ज्योतिष्पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती जी महाराज में विलीन होकर पुनः अपने मूल स्वरूप में स्थित हो गई।

दर्शनीय -स्थल-

ज्योतिर्मठ आज जोशीमठ के रूप में जाना जाता है ।जोशीमठ अब पूरा एक कस्बा और तहसील मुख्यालय है जिनमें अनेक दर्शनीय स्थल हैं। इनके दर्शन अवश्य करें- आदि शंकराचार्य गुफा। कल्पवृक्ष। ज्योतिरीश्वर महादेवजी। श्रीपूर्णागिरिदेवीजी। ब्रह्मलीन स्वामी ब्रह्मानन्द सरस्वतीजी एवं ब्रह्मलीन स्वामी कृष्णबोधाश्रम जी की गद्दी। श्री लक्ष्मीनारायणजी। इनके अतिरिक्त अन्य धर्मस्थान भी क्षेत्र में विद्यमान हैं। जैसे- ज्योतिष्पीठाधीश्वर जी की गद्दी, चतुष्षष्टि योगिनी दर्शन, नवग्रह दर्शन, तोटकाचार्य गुफा, भगवती राजराजेश्वरी श्रीदेव्यम्बा, श्रीसंकर्षण, श्रीभविष्यकेदार, श्री वासुदेवजी, श्रीकल्पवृक्ष, श्री त्रिमुंड्यावीर, श्रीज्योति (दंड)धारा, मूल ज्योतिर्मठ, श्रीलक्ष्मीनारायण विग्रह, श्री नृसिंह मंदिर आदि।

ज्योतिर्मठ का वर्तमान स्वरूप

ब्रह्मलीन स्वामी ब्रह्मानंद सरस्वती जी महाराज

विक्रमी 1998 तदनुसार ईस्वी सन् 1941 में तत्कालीन भारत की प्रतिनिधि सनातन धर्म संस्था ‘भारत धर्म महामंडल, काशी’ के अनुरोध पर अन्य तीनों पीठों के शंकराचार्यों ने ज्योतिष्पीठ /ज्योतिर्मठ को मूल स्थान पर पुनर्स्थापित करने के उद्देश्य से मठस्थान पर महामण्डल से मठ निर्माण करवाकर महान् विद्वान् संन्यासी पूज्यपाद स्वामी ब्रह्मानंद सरस्वती जी महाराज को ज्योतिष्पीठ पर अभिषिक्त कराया। पूज्यपाद महाराज जी जिन्हें ‘गुरुदेव ‘के नाम से जाना गया, 12 वर्ष ज्योतिष्पीठाधीश्वर के रूप में विराजमान रहे।

ब्रह्मलीन स्वामी कृष्णबोधाश्रमजी महाराज

चूँकि पूज्यपाद स्वामी ब्रह्मानंद सरस्वती जी महाराज ने अपने जीवन काल में अपना कोई उत्तराधिकारी घोषित नहीं किया था और उनके ब्रह्मलीन होने के पश्चात् खुले तथाकथित इच्छा पत्र में उल्लिखित नामों के अयोग्य पाए जाने पर तीनों शंकराचार्यों, भारत धर्म महामण्डल एवं काशी विद्वत् परिषद् ने चल ग्रन्थालय के रूप में प्रसिद्ध परमवीतराग स्वामी कृष्णबोधाश्रमजी महाराज को ज्योतिष्पीठ पर अभिषिक्त किया। वह 20 वर्षों तक ज्योतिष्पीठाधीश्वर के रूप में विराजे और सनातन धर्म का प्रचार-प्रसार किया।

वर्तमान जगद्गुरु शंकराचार्यजी
पूज्यपाद ज्योतिष्पीठाधीश्वर एवं द्वारका शारदापीठाधीश्वर
जगद्गुरु शंकराचार्य
स्वामी श्री स्वरूपानंद सरस्वती जी महाराज –

पूज्यपाद स्वामी कृष्णबोधाश्रम जी महाराज ने भी अपने जीवनकाल में अपना कोई उत्तराधिकारी घोषित नहीं किया। उनके ब्रह्मलीन होने के बाद पुनः ज्योतिष्पीठ को रिक्त देखकर विक्रमी 2030 तदनुसार ईस्वी सन् 1973 में तीनों शंकराचार्यों, भारत धर्म महामण्डल एवं विद्वानों की परिषद् ने पूज्यपाद स्वामी स्वरूपानंद सरस्वतीजी महाराज को ज्योतिष्पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य के रूप में अभिषिक्त किया। तब से आज तक पूज्यपाद महाराजश्री ने ज्योतिर्मठ की ज्योति से समग्र क्षेत्र को आलोकित कर रखा है। इस अभिनव तीनों पीढ़ी के आचार्यों के स्मरण में ये श्लोक नित्य पढ़े जाते हैं –
बाणोर्मिब्रह्मवर्षान्ते  ब्रह्मानन्दः सरस्वती।
तदन्ते कृष्णबोधास्तु ह्यभिषिक्ता ह्यतः क्रमात्।।
स्वरूपानन्दपादास्तु साम्प्रतं समधिष्ठिताः।
ज्योतिष्पीठस्य सन्त्येते ह्याचार्याः वर्णिताः क्रमात्।।
य  एतान् संस्मरेन्नित्यं वांछितं समवाप्नुयात्।।
परमाराध्यचरण  पूज्यपाद ज्योतिष्पीठाधीश्वर एवं द्वारका शारदापीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती जी महाराज एक ऐसे संन्यासी हैं जिन्होंने अल्पवय में ही गृहत्याग कर अपनी आध्यात्मिक साधना को आरंभ कर दिया था। उन्होंने भारतीय  स्वातंत्र्य संग्राम, गोरक्षा आंदोलन, श्रीरामजन्मभूमि पुनरुद्धार, रामसेतु संरक्षण आदि अनेक ऐतिहासिक कार्य किए हैं।

श्री द्वारकाशारदापीठाधीश्वर

इतिहास में आदि शंकराचार्य जी के बाद आप पहले ऐसे आचार्य हैं जिन्होंने आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित चार पीठों में से दो पीठों पर विधिवत अभिषिक्त होकर भगवत्पाद शंकराचार्य के सिद्धांतों का लंबे समय तक प्रचार किया है। आप ईस्वी सन् 1973 से ज्योतिर्मठ और 1982 से द्वारका शारदामठ दोनों पीठों पर विराजमान रहकर धर्मोन्नयन कर रहे हैं।

ज्योतिर्मठ संबंधी विवाद-

ज्योतिर्मठ के  संदर्भ में कुछ लोगों ने विवाद भी उत्पन्न करना चाहा। असल में ज्योतिर्मठ के अपने मूल स्थान पर पुनः स्थापित होने से धर्म विरोधियों को स्वाभाविक परेशानी खड़ी हुई और उन्होंने षड्यंत्र आरंभ कर दिए। उनको अवसर तब मिला जब पूज्यपाद ब्रह्मानंद सरस्वती जी महाराज के ब्रह्मलीन होने के अनंतर उनका तथाकथित इच्छा पत्र लेकर उपस्थित हुए लोगों को तीनों शंकराचार्यों, भारत धर्म महामण्डल एवं काशी विद्वत् परिषद् आदि ने अयोग्य कहते हुए परम विद्वान् एवं परम तपस्वी पूज्यपाद स्वामी कृष्णबोधाश्रमजी महाराज को ज्योतिष्पीठ पर अभिषिक्त कर दिया। उन्होंने तब से लेकर अब तक विवाद को बनाए रखा और ज्योतिर्मठ की प्रगति में बाधा डालते रहे। उन लोगों ने वर्णाश्रम विरोधी संस्थाओं से हाथ मिलाकर आदि शंकराचार्य जी के मठाम्नाय महानुशासनम् का उल्लंघन किया। पूज्यपाद ब्रह्मानंद सरस्वती जी महाराज के तथाकथित इच्छा पत्र की भी अवमानना की और पीठ की सम्पत्तियों पर बलपूर्वक कब्जा तो किया पर उसकी न तो सही से देख-रेख की और न ही उसमें कोई वृद्धि ही की। न तो पीठस्थान से कोई उल्लेखनीय लोक-कल्याणकारी कार्य ही किये। भगवद्कृपा और पूज्यपाद वर्तमान शंकराचार्यजी महाराज के प्रयासों से न्यायालय से वे  निषेधित हुए और ज्योतिर्मठ के विकास, प्रकाश का मार्ग प्रशस्त हुआ ।

ज्योतिर्मठ की प्रवृत्तियां –

ज्योतिर्मठ, परंपरा से लोगों को ज्ञान, मान और दान देता चला आ रहा है। लोगों को विविध विद्याओं का ज्ञान देना, विद्वानों और समाज के लिए कुछ अच्छा करने वालों को मान देना और दीन-दुःखी आर्त जनों की सहायता करने के लिए सदा उद्यत रहना ज्योतिर्मठ का स्वभाव है। जैसे यहाॅ के अन्नक्षेत्र से कोई कभी भूखा नहीं लौटता वैसे ही यहाँ आया व्यक्ति अगर सच्चे मन से आया है तो निराश तो लौटता ही नहीं, उसे उसका अभिलषित ईश्वर कृपा से अवश्य मिलता है। इन सबके लिए ज्योतिर्मठ के 108 सेवालय  सदा सक्रिय रहते हैं।

भावी योजनाएँ –

वैसे तो अनेक योजनाएँ हैं जिनमें से 3 प्राथमिक यह है, पहला – वर्तमान में क्षेत्रीय जनता की आवश्यकताओं को देखते हुए जोशीमठ में 100 बिस्तरों का एक चिकित्सा सेवालय (अस्पताल ) दूसरा – एक विविध विद्याओं को प्रदान करने वाला विद्या सेवालय (विद्यापीठ ) तथा तीसरा – क्षेत्रीय देव मंदिरों में पूजा इत्यादि की व्यवस्था को सुनिश्चित करना ज्योतिर्मठ की प्राथमिकताओं में है।

धर्म की जय हो। अधर्म का नाश हो।

प्राणियों में सद्भावना हो। विश्व का कल्याण हो।

ज्योतिष्पीठ की परम्परा

आचार्य शंकर ने ११ वर्ष की अवस्था में ही बद्रीनाथ धाम की यात्रा की थी। उस समय बौद्धों ने बद्रीनाथ धाम में मन्दिर को ध्वस्त कर भगवान् की प्रतिमा को नारद कुण्ड में फेक दिया था।  आचार्य जी ने योग बल से उस प्रतिमा को ढूँढ निकाला था तथा उसे मन्दिर में स्थापित कर दिया।  उन्होंने ध्वस्त मन्दिर का पुनर्निर्माण कर दिया।  बद्रीनाथ में शीतकाल में अत्यधिक बर्फ गिरती है, इसलिए उन्होंने बद्रीनाथ में स्थापित मन्दिर का स्थायी कार्यालय जोशीमठ में बनाया।  पुराणों में ज्योतिर्मठ को गुप्त तीर्थ कहा गया है।  वहाँ पर ब्रह्मज्योति का स्थायी रूप में निवास है तथा वहाँ वह ज्योति मुक्तिदायिनी है।  यहीं पर आचार्य जी ने २ वर्ष तक तप का वरण किया और उन्हें उस ज्योति के दर्शन हुए। इस ज्योति को धर्मज्योति भी कहा जाता है।  इस ज्योति के प्रकाश से आचार्य पाद ने विधर्मियों के मतों का खण्डन कर सनातन वैदिक धर्म की मर्यादा को अक्षुण्ण बनाए रखने में महनीय सफलता प्राप्त की।  इस ज्योति  प्रताप उनके द्वारा स्थापित ज्योतिष्पीठ पर पदासीन शंकराचार्य में दिखाई पडता है। 

          आचार्यपाद ने अपने प्रिय शिष्य तोटकाचार्य को ज्योतिर्मठ प्रथम आचार्य पद पर आसीन किया और अपने द्वारा पुनस्थापित भगवान् आदि बद्रीनारायण की षूजा अर्चना का भार उन्हीं के ऊपर छोड़ दिया । तब से शंकराचार्य की व्यवस्था में ही बद्रीनारायण मन्दिर की पूजा व्यवस्था चलती रही । इसमें इक्कीस आचार्य चिरजीवी थे 21 और आचार्य थे जिनका नाम बदरीनाथ मंदिर की परम्परा में उल्लिखित है । ज्योतिर्मठ के संवत् 1833 तक पदारूढ आचार्य जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी राम कृष्णाचार्य जी थे जिनका नाम परम्परा सूची में दर्ज है । उनकी ब्रह्मीभूत हो जाने पर मठाम्नाय एवं महानुशासन में वर्णित योग्यताओं का धारक व्यक्ति नहीं मिल सका । इसी बीच गढ़वाल राज्य की तत्कालीन राजनीतिक एवं भौगोलिक परिस्थितियाॅ बद से बदतर होती गईं । फलतः ज्योतिर्मठ की गद्दी संवत् 1998 तक लगभग 165 वर्षों तक रिक्त पड़ी रही । इस बीच मन्दिर की पूजा अर्चना का भार टिहरी गढवाल नरेश के आदेश से वहाँ के पुजारी जो बाल ब्रह्मचारी होते थे और जिन्हें रावल की उपाधि दी गई थी को सौंप दिया । यह व्यवस्था संवत् 1997 सन् 1940 ई. तक चलती रही । पूजन अर्चन की इस वैकल्पिक व्यवस्था के साथ साथ शंकराचार्य की गद्दी अविच्छिन्न रूप से बद्रीनाथ के मन्दिर में लगती रही जिसे आज भी बद्रीनाथ मन्दिर और जोशीमठ के नरसिंह मन्दिर में देखा जा सकता है । ज्योतिर्मठ के आचार्य विहीन होकर जीर्ण शीर्ण हो जाने पर आचार्य शंकर एवं तोटकाचार्य की गुफाएँ, अमर शहतूत वृक्ष और भगवान् ज्योति रीश्वर ये सभी अवशेष मठ का पता निर्देश करने के लिए अस्तित्व में बने रहे ।

          संवत् 1958 सन् 1901 में भारत धर्म महामण्डल की स्थापना हुई थी । स्थापना के 35 वर्षों बाद श्री भारत महामण्डल के उत्कर्ष काल में संवत् 1995 के आस-पास इसके संस्थापक पूज्यपाद स्वामि ज्ञानानन्द सरस्वती जी महाराज का ध्यान ज्योतिर्मठ की ओर गया और उन्होंने अन्य तीन पीठों के शंकराचार्यो , तत्कालीन राजाओं- महाराजाओं और सनातन धर्म के विद्वानों की सहमति से लगभग विच्छिन्न अवशेषों की खोज हेतु एक शिष्ट मण्डल बद्रिकाश्रम भेजा था । उसकी जानकारी के आधार पर जोशीमठ की भूमि का पता लगाया । तोटकाचार्य की गुफा के आधार पर उन्होंने मठ की भूमि निश्चित करके टिहरी गढवाल के तत्कालीन जिलाधीश महोदय के सौजन्य से वह भूमि भी ज्योतिर्मठ के लिए प्राप्त कर ली । जो सरकारी कागजातों में ज्योतिर्मठ के नाम से अंकित चली आ रही है 
          इसके पश्चात स्वामी ज्ञानानन्द जी महाराज ने भारत धर्म महामण्डल के तत्वावधान में अन्य तीन पीठ के शंकराचार्यों राजाओं महाराजाओं एवं सनातन धर्म के विद्वानों के सहयोग से परम विद्वान् मनीषी, त्रिकालदर्शी एवं परम तपस्वी स्वामी ब्रह्मानन्द सरस्वती जी को मठाम्नाय एवं महानुशासन में वर्णित सभी योग्यताओं का धारक मानकर ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य पद पर चैत्र शुक्ल चतुर्थी संवत् 1998 को अभिषिक्त कर दिया । इसकी घोषणा भारत धर्म महामण्डल के तत्कालीन सभापति श्रीमान् महाराजाधिराज सर कामेश्वर सिंह बहादुर ने काशी की अखिल भारतीय सनातन धर्म के महासम्मेलन में की । स्वामी ज्ञानानन्द ने जो भूमि प्राप्त की उस पर उन्होंने पूर्णाम्बा तथा ज्योतिरीश्वर मन्दिर तथा ज्योतिर्मठ का निर्माण किया एवं काशी की वरुणा तट की भूमि को मिलाकर एक ट्रस्ट डीड बनाई और उन्हें (श्री स्वामी ब्रह्मानन्द सरस्वती जी महाराज को) एकमात्र ट्रस्टी बना दिया । ब्रह्मानन्द सरस्वती जी महाराज का शंकराचार्य पद पर चैत्र शुक्ल चतुर्थी संवत् 1998 तदनुसार सन् 1941 ई. में काशी में ही अभिषेक हुआ था । उन्होंने 12 वर्षों तक शंकराचार्य पद के गुरुतर भार का उत्तरदायित्व पूर्ण ढंग से निर्वाह किया । उच्छिन्न ज्योतिर्मठ के जीर्णोद्धार की व्यवस्था की और मठ में लगभग सभी अधूरे कार्यों को पूर्णता प्रदान की । सन् 1953 ई. की 21 मई को स्वामी ब्रह्मानन्द जी महाराज ब्रह्मलीन हो गए ।
          भारत धर्म महामण्डल ने स्वामी ब्रहानन्द सरस्वती जी महाराज के योग्यतम शिष्य परम वीतराग धर्म सम्राट् स्वामी श्री करपात्री जी महाराज को उस पद पर अभिषिक्त करना चाहा परन्तु पूज्य वर ने इसे स्वीकार नहीं किया । तब अपने घोषणा पत्र से प्राप्त अधिकार को आधारतः लेते हुए श्री भारत धर्म महामण्डल ने अन्य पीठों की सहमति सनातन धर्मानुयायी संस्थाओं एवं वर्णाश्रम धर्मानुयायी विद्वानों की उत्कृष्ट इच्छा एवं पूज्य स्वामी करपात्री जी महाराज की सहर्ष स्वीकृति से योगिराज परम तपस्वी स्वामी कृष्णबोधाश्रम जी महाराज को ज्योतिर्मठ के श्री शंकराचार्य पद पर अभिषिक्त कर दीया उस पट्टाभिषेक समारोह में द्वारका शारदापीठ के तत्कालीन जगतगुरु शंकराचार्य स्वामी अभिनव सच्चिदानन्द तीर्थ जी महाराज।धर्मसम्राट परमपूज्य अनन्तश्रीविभूषित स्वामी करपात्री जी महाराज पूज्यपाद स्वामी स्वरूपानन्द सरस्वती जी महाराज पं द्वारका प्रसाद शास्त्री  स्वामी विष्णुदेवानन्द सरस्वती जी  महाराज तथा स्वामी परमानंद सरस्वती जी महाराज आदि भी उपस्थित थे । इन सभी लोगों ने काशी में स्वामी कृष्ण बोधाश्रम जी महाराज का अभिषेक किया था । वे लगभग 20 वर्षों तक ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य पद पर विद्यमान रहे । जब वे अस्वस्थ हो गए तो उन्होंने उक्त पद के गुरुतर भार कॅ वहन करने में अपनी असमर्थता व्यक्त की तथा धर्म सम्राट् पूज्य स्वामी करपात्री जी महाराज सनातन धर्मानुयायी संस्थाओं श्री भारत धर्म महामण्डल, श्री काशी विद्वत् परिषद्, अखिल भारतीय धर्म संघ को यह सूचित करवाया कि उनके स्थान पर पूज्य स्वामी स्वरूपानन्द सरस्वती जी महाराज का ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य पद पर अभिषेक कर दिया जाए । उनके इस प्रस्ताव को सभी संस्थाओं ने सहर्ष स्वीकार कर लिया । सन् 1973 ई. में पूज्य पाद स्वामी श्री कृष्ण बोधाश्रम जी महाराज के ब्रह्मीभूत हो जाने के पश्चात उनकी इच्छा का सम्मान करते हुए दिल्ली में अत्यन्त धूमधाम से ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य पद पर स्वामी श्री करपात्री जी महाराज ने अनन्य स्नेह पात्र सहयोगी स्वामी श्री स्वरूपानन्द सरस्वती जी महाराज का अभिषेक किया ।
          उक्त अभिषेकोत्सव में द्वारका और पुरी के तत्कालीन शंकराचार्य जी महाराज स्वयं पधारे थे । श्रृगेरी के जगद्गुरु जी महाराज के प्रतिनिधि उनकी ओर से उपस्थित हुए थे । भारत धर्म महामण्डल अखिल भारतीय धर्म संघ तथा काशी विद्वत् परिषद् के प्रतिनिधियों ने उक्त अभिषेक में सक्रिय होकर भाग लिया था तथा सम्पूर्ण कार्यक्रम धर्म सम्राट् पूज्य पाद अनन्त श्री विभूषित स्वामी स्वामी करपात्री जी महाराज के तत्वावधान में संचालित हुआ था । तब से लेकर अद्यावधि पूज्य पाद अनन्त श्री विभूषित स्वामी स्वरूपानन्द सरस्वती जी महाराज जगद्गुरु शंकराचार्य पद के भार का अत्यंत प्रभावी ढंग से निर्वहन कर रहे हैं ।

          तीनों पीठों के शंकराचार्य, सनातन धर्मानुयायी संस्थाओं, वर्णाश्रम धर्मानुयायी विद्वानों एवं धर्म सम्राट् पूज्य पाद स्वामी करपात्री जी महाराज ने स्वामी स्वरूपानन्द सरस्वती जी महाराज को शुचि, जितेन्द्रिय, वेद-वेदांगादिविशारद एवं सभी शास्त्रों के समन्वय का ज्ञाता मान्य करते हुए ज्योतिर्मठ पर अभिषिक्त किया था । उनके इन्हीं गुणों से प्रभावित होकर तथा समाज कल्याण के लिए उनके द्वारा किए गए कार्यों का मूल्यांकन करते हुए द्वारका शारदापीठ के तत्कालीन शंकराचार्य स्वामी अभिनव सच्चिदानन्द तीर्थ जी ने उन्हें योग्यतम आचार्य स्वीकार किया तथा अपनी अन्तिम इच्छा पत्र (वसीयत) में !’द्वारका शारदापीठ के शंकराचार्य पद पर स्वामी स्वरूपानन्द सरस्वती जी महाराज का अभिषिक्त किया जाए” ऐसा लिखा । तब श्रृगेरी के तत्कालीन जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी श्री अभिनव विद्यातीर्थ जी महाराज द्वारा द्वारका शारदापीठ पर स्वामी स्वरूपानन्द सरस्वती जी को अभिषिक्त किया गया । तब से आज तक परम पूज्य श्रीचरण दोनों के आचार्य पद का गुरुतर भार वहन करते आ रहे हैं ।

          सन् 1973 ई. में ज्योतिष्पीठ के आचार्य पद का भार वहन कर पूज्य श्रीचरण ने अनेक लोकोपकारी कार्यों का सम्पादन जिस तत्परता से करते आए हैं उससे उन्होंने अपने संन्यास की सार्थकता सिद्ध कर दी है। संन्यास धर्म का एक अत्यंत महत्वपूर्ण लक्ष्य मानवता की सेवा कर उस ऋण का अपाकरण करना है जिसे महाभारतकार ने मनुष्य की संज्ञा दी है । इसीलिए सम्पूर्ण देश ने ज्योतिष्पीठारोहण महोत्सव के 25 वर्ष पूरे होने पर मानवता की सेवा की तन्मयता और सार्थकता को देखकर इसकी रजत जयन्ती मनाने का संकल्प लिया एवं पूर्ण मनोयोग से यह महोत्सव देश के कोने-कोने में अत्यंत श्रद्धा के साथ मनाया गया । यही इन महामनीषी के संन्यास धर्म की भौतिक सार्थकता थी । जिसे राष्ट्रीय मंच ने मूर्त रूप देकर गुरु ऋण से स्वयं को मुक्त किया । भक्तों, देशवासियों एवं विशेषकर समाज के दुर्बलतम वर्गों के भौतिक एवं आध्यात्मिक उन्नति के लिए महाराज श्री ने संन्यासी रूप में जो महान् कार्य किए हैं उसका समादर देश आज उनके संन्यास की स्वर्ण जयन्ती महोत्सव को आयोजित कर रहा है । ज्योतिष्पीठ की अक्षुण्ण एवं महान् परम्पराएॅ जीवन्त हो उठी हैं  और भगवान् आद्य शंकराचार्य को निश्चित रूप से परम पूज्य श्रीचरणों के महनीय कार्यों का अवलोकन कर अत्यंत आनन्द का अनुभव हो रहा होगा क्योंकि पूज्य महाराजश्री ने ज्योतिष्पीठ के शंकराचार्य के रूप में उन सभी लक्ष्यों कॅ प्राप्त कर लिया और उन सभी भूमिकाओं का निर्वहन कर दिया जिनके लिए भगवान् आद्य शंकराचार्य ने इस पीठ की स्थापना की थी ।

          पूज्य महाराज श्री वर्तमान में देश के सर्वाधिक चातुर्मास्य व्रत कर चुके वरिष्ठ संन्यासी हैं । भक्तों ने उनके संन्यास की स्वर्ण जयन्ती तो मनाई ही है और अब हीरक जयन्ती मनाने की तैयारियाँ कर रहे हैं ।

         समस्त मनुष्य कल्याण पथ के अनुगामी बने, सनातन धर्म की मर्यादाएॅ सुरक्षित रहें तथा सम्पूर्ण भारत देश सुख-समृद्धि, शान्ति तथा सद्भाव की धारा में अवगाहन करता रहे: यही पूज्य जगद्गुरु शंकराचार्य जी महाराज की मंगल कामना है ।